मध्य प्रदेश में गेहूं की पराली जलाने के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं और स्थिति अब चिंताजनक हो चुकी है। पिछले 5 वर्षों में राज्य में 77 हजार से ज्यादा मामले सामने आए हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में पराली जलाने के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।
सबसे ज्यादा मामले विदिशा और उज्जैन जिलों में दर्ज किए गए हैं। इन इलाकों में किसान बड़ी मात्रा में फसल अवशेष को जलाकर खेत साफ कर रहे हैं, जिससे हवा में जहरीला धुआं फैल रहा है। यह धुआं न केवल आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ाता है, बल्कि सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी कई गुना बढ़ा देता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसें वातावरण में फैलती हैं, जो जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ावा देती हैं। इसके अलावा, मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है, जिससे लंबे समय में खेती को नुकसान होता है।
सरकार द्वारा इस पर रोक लगाने के लिए नियम बनाए गए हैं और किसानों को जागरूक करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर इनका असर सीमित नजर आ रहा है। कई जगहों पर नियमों का पालन नहीं हो रहा है, जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।
पराली प्रबंधन के लिए मशीनों और वैकल्पिक उपायों की जानकारी और उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत है, ताकि किसान बिना जलाए खेत साफ कर सकें। अगर इस दिशा में तुरंत और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है।
यह मुद्दा केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ा एक बड़ा संकट बनता जा रहा है, जिसे नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है।

