इस गांव के 2500 बेटे विदेश में फंसे, घर-घर में दहशत…
खबर पश्चिम उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर से है।
अपनों की चिंता: खाड़ी में 2500 ग्रामीण, गांव में बेचैनी।
ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालातों ने हजारों किलोमीटर दूर बसे एक छोटे से गांव की रातों की नींद छीन ली है। जनपद मुजफ्फरनगर के कस्बा चरथावल क्षेत्र स्थित कुटेसरा गांव के लगभग 2000 से 2500 लोग खाड़ी देशों में रोज़गार के लिए गए हुए हैं। इनमें से अधिकांश सऊदी अरब, दुबई, कतर और कुवैत में काम कर रहे हैं।
युद्ध की आहट भले ही सरहदों पर हो, लेकिन उसका असर सीधे गांव की चौपाल तक पहुंच गया है। गांव में रह रहे माता-पिता, पत्नियां और छोटे-छोटे बच्चे हर पल फोन की घंटी का इंतजार कर रहे हैं। हर कॉल के साथ दिल धड़कता है—”सब ठीक तो है ना?”
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मिसाइलों की दहशत, फोन पर आती हैं खबरें
परिजनों का कहना है कि वहां मौजूद उनके परिवार के सदस्य बताते हैं कि कई बार उनके ऊपर से मिसाइलें गुजरती हैं। वे बताते हैं कि ये मिसाइलें अमेरिका के ठिकानों की ओर जाती हैं। फिलहाल उनके मुताबिक वे सुरक्षित हैं, लेकिन खतरे का साया बना हुआ है।
रोजाना वीडियो कॉल और ऑडियो कॉल के ज़रिए हालचाल लिया जा रहा है। लेकिन जब समाचार चैनलों पर युद्ध की तस्वीरें दिखाई देती हैं, तो गांव के हर घर में सन्नाटा पसर जाता है।
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“हमारे घर से ही सात लोग गए हैं” – मोहम्मद कामिल
कुटेसरा गांव के पूर्व जिला पंचायत सदस्य मोहम्मद कामिल ने बताया कि गांव की आबादी करीब 30 हजार है और लगभग ढाई हजार युवा खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा,
> “हमारे घर से ही सात लोग गए हुए हैं। पांच भतीजे, एक बेटा और एक छोटा भाई रियाज में हैं। कोई सिलाई का काम करता है, कोई क्लीनिंग करता है, कोई मजदूरी करता है। रोज बात होती है, बच्चे कहते हैं कि दिक्कत नहीं है, लेकिन झगड़ा बढ़ा तो परेशानी हो सकती है। ईद पर आने वाले थे, टिकट भी नहीं हो पा रहे हैं। सरकार से हमारी विनती है कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो हमारे बच्चों को सुरक्षित वापस लाया जाए।”
उनकी आवाज़ में चिंता साफ झलकती है, लेकिन साथ ही वे प्रशासन की सतर्कता की भी सराहना करते हैं।
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“तीनों बेटे रियाज में हैं” – मोहम्मद मतलूब
गांव के ही निवासी मोहम्मद मतलूब ने बताया कि उनके तीन बेटे सऊदी अरब के रियाज में मजदूरी कर रहे हैं।
> “एक बेटा 7-8 साल से है, दूसरा दो साल से और तीसरा डेढ़ साल से वहां है। डर तो बना हुआ है। ईद पर आने वाले थे, टिकट भी हो गए थे, लेकिन अब फ्लाइट बंद हैं। सरकार से मांग है कि अगर हालात बिगड़ें तो बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया जाए।”
उन्होंने कहा कि गांव के लगभग हर घर से एक या दो युवा खाड़ी देशों में काम करने गए हुए हैं। ऐसे में चिंता सिर्फ एक परिवार की नहीं, पूरे गांव की है।
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“मां-बाप की चिंता अलग होती है” – मोहम्मद इंतजार
ग्रामीण मोहम्मद इंतजार ने बताया कि उनके दो बेटे सऊदी अरब में हैं।
> “शाम को बात हुई थी, कह रहे हैं सब ठीक है, लेकिन मिसाइल ऊपर से गुजरती हैं तो डर लगता है। एक बेटा 10 साल से वहां है, दो-दो साल में आता रहता है। इस बार ईद पर आने वाला था, अब नहीं आ पाएगा। घर में मां-बाप की चिंता रहती है। सरकार से यही अपील है कि अगर मामला बिगड़े तो हमारे बच्चों को सुरक्षित देश में लाया जाए।”
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प्रशासन की सतर्कता, 24 घंटे कंट्रोल रूम सक्रिय
मुजफ्फरनगर जिला प्रशासन ने हालात की गंभीरता को देखते हुए पहले से ही विशेष तैयारी कर रखी है। जिला कलेक्ट्रेट में इमरजेंसी कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है, जो 24 घंटे सक्रिय है।
हेल्पलाइन नंबर 1077 जारी किया गया है, ताकि जिन परिवारों का कोई सदस्य युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में फंसा है, वे जानकारी दे सकें और आवश्यक सहायता प्राप्त कर सकें।
प्रशासन की इस तत्परता की ग्रामीणों ने सराहना की है। अधिकारियों का कहना है कि शासन स्तर पर भी विदेश मंत्रालय से लगातार समन्वय किया जा रहा है और यदि आवश्यकता पड़ी तो सुरक्षित निकासी की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
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गांव की हर गली में एक ही चर्चा
कुटेसरा की गलियों में इन दिनों सिर्फ एक ही विषय है—”वहां हालात कैसे हैं?”
चाय की दुकानों पर, मस्जिद के बाहर, खेतों में काम करते लोगों के बीच—हर बातचीत खाड़ी देशों में गए अपने बेटों की चिंता से शुरू होती है और वहीं खत्म होती है।
कई घरों में ईद की तैयारियां अधूरी रह गई हैं। जिन बेटों के लिए नए कपड़े खरीदे गए थे, वे अलमारी में ही टंगे रह गए। जिन मांओं ने सेवइयां बनाने की योजना बनाई थी, वे अब दुआओं में हाथ उठाए बैठी हैं।
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उम्मीद और दुआओं के सहारे
हालांकि फिलहाल सभी प्रवासी सुरक्षित बताए जा रहे हैं, लेकिन अनिश्चितता का डर बना हुआ है। गांव के लोग एक ओर सरकार और प्रशासन पर भरोसा जता रहे हैं, तो दूसरी ओर हर नमाज़ और हर प्रार्थना में अपनों की सलामती की दुआ मांग रहे हैं।
यह कहानी सिर्फ कुटेसरा गांव की नहीं, बल्कि उन हजारों भारतीय परिवारों की है जिनके सपने और रोज़गार सरहदों के पार जुड़े हैं।
दूर कहीं युद्ध की आग जल रही है, लेकिन उसकी तपिश मुजफ्फरनगर के इस गांव के हर घर में महसूस की जा रही है।
अब सबकी निगाहें हालात पर हैं—और दिलों में बस एक ही अरदास है:
“हमारे बच्चे सुरक्षित लौट आएं।”
जनपद मुजफ्फरनगर से सचनामा न्यूज़ के लिए संवाददाता तनवीर मलिक की रिपोर्ट।

