लखनऊ में अधिवक्ताओं के साथ हुई कार्रवाई ने पूरे प्रदेश के वकील समाज में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। वकीलों का कहना है कि उनके चैंबर सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होते, बल्कि वही उनकी रोज़ी-रोटी, सम्मान और न्याय की लड़ाई का आधार होते हैं। ऐसे में चैंबरों पर बुलडोज़र चलना और विरोध कर रहे अधिवक्ताओं पर लाठीचार्ज होना केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उनके सम्मान और अधिकारों पर सीधा हमला माना जा रहा है।
पीड़ित अधिवक्ताओं से मुलाकात के बाद विपक्षी नेताओं ने भी इस पूरे मामले को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि पुरुष और महिला वकीलों पर जिस तरह बल प्रयोग किया गया, उससे न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ है। अधिवक्ताओं का आरोप है कि बिना समुचित व्यवस्था और संवाद के उनकी रोज़ी-रोटी छीनने का प्रयास किया गया, जबकि वे वर्षों से वहीं बैठकर आम लोगों को न्याय दिलाने का काम करते रहे हैं।
वकील संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज़ किया जाएगा। उनका कहना है कि अधिवक्ता समाज किसी भी अन्याय के खिलाफ हमेशा खड़ा रहा है और अब जब उनके अपने अस्तित्व पर संकट आया है, तो वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। कई अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि अगर सरकार और प्रशासन ने उनकी आवाज़ नहीं सुनी तो प्रदेशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे।
राजनीतिक बयानबाज़ी भी इस मामले में तेज़ हो गई है। विपक्ष ने भाजपा सरकार पर “न्याय विरोधी मानसिकता” का आरोप लगाते हुए कहा कि जो लोग न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, उन्हीं पर कार्रवाई करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। साथ ही यह भी कहा गया कि अधिवक्ताओं का अपमान पूरे न्यायिक तंत्र का अपमान है।
इस घटना के बाद प्रदेशभर के वकीलों में भारी नाराज़गी देखी जा रही है। बार एसोसिएशनों और अधिवक्ता संगठनों ने सरकार से तत्काल वार्ता, कार्रवाई पर रोक और प्रभावित अधिवक्ताओं के पुनर्वास की मांग उठाई है। मामला अब केवल चैंबर हटाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे अधिवक्ताओं के सम्मान, अधिकार और न्याय व्यवस्था से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

