पूरी दुनिया के मुसलमानों का मुकद्दस महीना रमज़ान शुरू हो रहा है। यह इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है और इसे बेहद पाक, रहमतों और बरकतों वाला महीना माना जाता है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर माहे रमज़ान क्या है और क्यों खास है?
रमज़ान क्या है?
रमज़ान इस्लामी हिजरी साल का नौवां महीना है। इसी महीने में मुसलमान रोज़ा रखते हैं। रोज़ा यानी सुबह सहरी (फज्र से पहले का खाना) से लेकर शाम मग़रिब (सूरज ढलने तक) कुछ भी खाना-पीना नहीं।
यह सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि अपने दिल, ज़ुबान और नज़र को भी गुनाहों से बचाना होता है।
क्यों है यह महीना इतना खास
इस महीने की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसी में क़ुरआन नाज़िल हुआ था। मुसलमानों के लिए यह अल्लाह की किताब है, जो इंसानों को सही रास्ता दिखाती है।
इसलिए रमज़ान को:
रहमत (अल्लाह की मेहरबानी)
मग़फ़िरत (गुनाहों की माफी)
और जहन्नम से निजात का महीना
कहा जाता है।
रोज़े का मकसद क्या है?
रोज़े का असली मकसद है:
सब्र (धैर्य) सीखना
गरीबों की भूख महसूस करना
खुद पर कंट्रोल करना
बुराई से दूर रहना
और अल्लाह के करीब होना
रोज़ा सिर्फ खाने-पीने से रुकने का नाम नहीं, बल्कि झूठ, चुगली, गाली, गुस्से और हर गलत काम से बचने का भी नाम है।
सहरी और इफ्तार क्या होता है?
सहरी: सुबह अज़ान से पहले खाया जाने वाला खाना
इफ्तार: शाम को अज़ान के साथ रोज़ा खोलना
अक्सर लोग खजूर और पानी से इफ्तार करते हैं, क्योंकि यह तरीका Prophet Muhammad की सुन्नत माना जाता है।
तरावीह और खास इबादत
रमज़ान की रातों में मस्जिदों में खास नमाज़ पढ़ी जाती है, जिसे तरावीह कहते हैं। इसमें पूरा महीना क़ुरआन शरीफ सुनाया जाता है।
इसके अलावा:
ज़्यादा नमाज़
दुआ
सदका और ज़कात देना
गरीबों की मदद करना
इन कामों का सवाब (अज्र) कई गुना बढ़ जाता है।
आख़िरी अशरा और शबे क़द्र
रमज़ान के आख़िरी 10 दिन बहुत अहम माने जाते हैं। इन्हीं में एक रात होती है शबे क़द्र, जिसे हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। इस रात की इबादत का सवाब बहुत ज्यादा मिलता है।
रमज़ान के बाद क्या?
30 रोज़ों के बाद आता है खुशियों का त्योहार ईद-उल-फितर। इस दिन मुसलमान अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं और एक-दूसरे से गले मिलते हैं।

