देश की राजनीति और आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा इन दिनों चर्चा में है। एक तरफ संसद में प्रधानमंत्री Narendra Modi की मौजूदगी को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर कई राज्यों में गैस सिलेंडर की कमी और आपूर्ति की गड़बड़ी ने आम लोगों की रसोई पर असर डालना शुरू कर दिया है।
संसद के सत्र के दौरान विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि प्रधानमंत्री महत्वपूर्ण बहसों और सवालों के समय सदन में कम दिखाई देते हैं। विपक्ष का कहना है कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय हालात जैसे गंभीर मुद्दों पर प्रधानमंत्री को सीधे संसद में जवाब देना चाहिए। विपक्षी नेताओं का दावा है कि लोकतंत्र में संसद सबसे बड़ा मंच है और वहां प्रधानमंत्री की मौजूदगी जरूरी है ताकि जनता के सवालों का जवाब मिल सके।
उधर देश के कई हिस्सों से एलपीजी गैस सिलेंडर की सप्लाई में बाधा और लंबी लाइनों की खबरें सामने आई हैं। कुछ जगहों पर लोग गैस एजेंसियों के बाहर घंटों खड़े रहने को मजबूर हैं। हालात ऐसे हो गए कि कई परिवारों ने फिर से लकड़ी और पुराने चूल्हों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, सप्लाई चेन में आई रुकावट और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण एलपीजी वितरण प्रभावित हुआ है। कई जगहों पर गैस एजेंसियों में भीड़ बढ़ गई है और लोगों को समय पर सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि देश में एलपीजी की कुल सप्लाई सामान्य है और राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्ती से कार्रवाई की जाए।
सरकार का यह भी कहना है कि गैस कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि उपभोक्ताओं तक समय पर सिलेंडर पहुंचाया जाए और अफवाहों पर ध्यान न दिया जाए। वहीं कुछ राज्यों में प्रशासन ने दावा किया है कि पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और घबराने की जरूरत नहीं है।
लेकिन जमीन पर दिख रही परेशानियों और संसद में उठ रहे सवालों ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि जनता महंगाई और गैस की परेशानी झेल रही है, जबकि सरकार जवाब देने से बच रही है। वहीं सरकार इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता रही है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि एक तरफ संसद में जवाबदेही को लेकर बहस तेज है, और दूसरी तरफ रसोई गैस की उपलब्धता को लेकर जनता की चिंता बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि “संसद से मोदी गायब, देश से सिलेंडर गायब” जैसे नारे राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते जा रहे हैं और सरकार से जवाब मांगे जा रहे हैं।

