मुजफ्फरनगर।
जनपद मुजफ्फरनगर की ग्राम पंचायत शेरपुर स्थित मदरसा दारुल उलूम रफीकिया ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो, मेहनत सच्ची हो और शिक्षा को इबादत समझकर दिया जाए, तो छोटे से गांव से भी बड़ी मिसालें पैदा होती हैं। मदरसे में आयोजित दो दिवसीय सालाना जलसे ने न केवल गांव बल्कि पूरे क्षेत्र में शिक्षा के प्रति नई सोच और भरोसे को मजबूत किया।
इस भव्य जलसे में शेरपुर गांव सहित आसपास के इलाकों से हजारों लोगों ने शिरकत की। कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि मदरसे में हो रही तालीम, बच्चों की प्रगति, एक साल में हुए खर्च, विकास कार्यों और भविष्य की योजनाओं को पूरे गांव के सामने पारदर्शिता के साथ रखना था। मदरसा प्रबंधन ने खुले मंच से एक-एक रुपये का हिसाब पेश कर यह संदेश दिया कि शिक्षा के नाम पर जनता का भरोसा सर्वोपरि है।
9 साल की उम्र में हिफ्ज़-ए-कुरान, पूरे गांव का सीना गर्व से चौड़ा
इस साल के जलसे का सबसे भावुक और ऐतिहासिक पल तब आया, जब मदरसे के छात्र मोहम्मद अबू हमज़ा ने महज 9 वर्ष की उम्र में पूरा कुरान शरीफ बिना देखे याद कर लिया। इतनी कम उम्र में यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि मदरसा दारुल उलूम रफीकिया में बच्चों की तालीम पर कितनी गंभीरता और लगन से काम किया जा रहा है।
यह कामयाबी सिर्फ एक बच्चे की नहीं, बल्कि उन उस्तादों और शिक्षकों की भी है, जो दिन-रात बच्चों की तरबियत और तालीम में जुटे रहते हैं।
शिक्षा को इबादत मानकर काम कर रहा मदरसा
मदरसे के प्रिंसिपल मौलाना मुफ्ती नाजिम करीम कासमी ने जलसे को संबोधित करते हुए कहा कि मदरसा हर साल इस आयोजन के जरिए समाज को यह बताना चाहता है कि बच्चों को किस तरह की तालीम दी जा रही है और मदरसे का एक-एक कदम शिक्षा की मजबूती के लिए उठाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब शिक्षा को लेकर तरह-तरह की शंकाएं पैदा की जाती हैं, ऐसे में मदरसा दारुल उलूम रफीकिया इल्म, अख़लाक और भरोसे की मिसाल बनकर खड़ा है।
दुआओं के साये में हुआ जलसे का समापन
दो दिन चले इस जलसे के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मुफ्ती अकमल साहब मौजूद रहे। उनकी दुआओं के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। हाफिज़ बनने वाले बच्चों को मदरसे की ओर से साइकिल, कुरान शरीफ, महत्वपूर्ण इस्लामी किताबें और रोजमर्रा की जरूरत का सामान इनाम में दिया गया, ताकि बच्चों का हौसला और बढ़े।
गांव का साथ, मदरसे की सबसे बड़ी ताकत
मौलाना मुफ्ती नाजिम करीम कासमी ने पूरे गांव का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जब भी मदरसे को किसी मदद की जरूरत पड़ी, शेरपुर का हर शख्स कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा नजर आया। यही एकता और सहयोग मदरसे की असली पूंजी है, जिसकी बदौलत शिक्षा के क्षेत्र में लगातार ऐतिहासिक काम हो रहे हैं।
मदरसा दारुल उलूम रफीकिया: सिर्फ इमारत नहीं, एक सोच
आज मदरसा दारुल उलूम रफीकिया सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि इल्म, ईमान, पारदर्शिता और समाजी एकता की पहचान बन चुका है। यहां से निकलने वाले बच्चे न सिर्फ धार्मिक रूप से मजबूत हो रहे हैं, बल्कि समाज को सही दिशा देने की तैयारी भी कर रहे हैं।
शेरपुर का यह मदरसा आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश दे रहा है कि अगर शिक्षा सच्चे इरादे से दी जाए, तो वही समाज की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
जनपद मुजफ्फरनगर से सचनामा न्यूज़ के लिए संवाददाता तनवीर मलिक की रिपोर्ट

