देश के कई राज्यों में आलू की कीमतों में आई तेज गिरावट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई इलाकों में किसानों को अपनी फसल का इतना कम दाम मिल रहा है कि लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। कई जगह मंडियों में आलू 4 से 5 रुपये प्रति किलो तक बिकने की खबरें सामने आई हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार कुछ मंडियों में आलू का भाव 200 से 450 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। हालात इतने खराब हो गए कि कई जगह किसान ट्रैक्टरों में भरे आलू लेकर मंडी पहुंचे, लेकिन खरीदार न मिलने पर वापस लौटना पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल कई इलाकों में आलू की पैदावार अच्छी हुई है, लेकिन मांग और बाजार व्यवस्था सही नहीं होने के कारण कीमतों पर भारी दबाव बन गया है। बिहार के समस्तीपुर और आसपास के क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार के बावजूद किसानों को कम दाम मिलने से वे लागत और भंडारण के खर्च के बीच फंस गए हैं।
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद और अन्य जिलों में स्थिति यह है कि किसान आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखने से भी बच रहे हैं, क्योंकि पिछले साल भंडारण के बाद भी उन्हें बेहतर कीमत नहीं मिल सकी थी। इसके कारण कई शीतगृह खाली रह गए हैं और किसान तुरंत फसल बेचने को मजबूर हैं।
किसान संगठनों का कहना है कि अगर सरकार समय पर हस्तक्षेप नहीं करती तो आलू उगाने वाले किसानों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है। कई किसान संगठनों ने सरकार से आलू के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने, निर्यात को बढ़ावा देने और बाजार में दाम स्थिर रखने के लिए सरकारी खरीद की व्यवस्था करने की मांग की है।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक भारत दुनिया के सबसे बड़े आलू उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के कारण किसानों की आय स्थिर नहीं रह पाती। अच्छी पैदावार होने पर अक्सर कीमतें गिर जाती हैं और इसका सीधा असर किसानों की कमाई पर पड़ता है।
कुछ राज्यों ने इस समस्या से निपटने के लिए कदम भी उठाए हैं। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए लाखों टन आलू सीधे खरीदने का फैसला किया है ताकि बाजार में कीमतें स्थिर रह सकें।
किसानों का कहना है कि अगर उचित कीमत, भंडारण की सुविधा और बाजार समर्थन नहीं मिला तो खेती करना उनके लिए लगातार कठिन होता जाएगा। ऐसे में सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किसानों को उनकी फसल का न्यायसंगत मूल्य कैसे मिले और कृषि को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाया जा सके।

