केंद्रीय बजट 2026–27 को लेकर किसानों, मज़दूरों और ग्रामीण समाज में भारी निराशा देखी जा रही है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बजट किसान, मज़दूर, आदिवासी समाज और ग्रामीण भारत की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका है।
उन्होंने कहा कि देश का किसान इस समय बढ़ती महंगाई, खेती की लागत में लगातार हो रही बढ़ोतरी, खाद-बीज-डीज़ल के महंगे दाम, कर्ज़ के बोझ और घटती आमदनी से जूझ रहा है, लेकिन बजट में किसानों को राहत देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। न तो कर्ज़माफी को लेकर कोई घोषणा की गई और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने की लंबे समय से उठ रही मांग को बजट में जगह दी गई।
ग्रामीण रोज़गार के सवाल पर भी टिकैत ने बजट को निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा कि गांवों में बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है और बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। इसके बावजूद बजट में न तो रोज़गार योजनाओं को मज़बूत करने का स्पष्ट प्रावधान है और न ही न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने व मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा को लेकर कोई ठोस नीति सामने आई है।
आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर भी बजट पर सवाल खड़े किए गए हैं। चौधरी राकेश टिकैत ने कहा कि जल-जंगल-ज़मीन की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे बुनियादी विषयों को बजट में वह प्राथमिकता नहीं दी गई, जिसकी ज़रूरत थी। इससे आदिवासी क्षेत्रों में पहले से मौजूद समस्याएं और गहराने की आशंका है।
उन्होंने आरोप लगाया कि बजट का रुख ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के बजाय शहरी और कॉरपोरेट हितों की ओर ज़्यादा दिखाई देता है। टिकैत के अनुसार यह बजट ज़मीनी सच्चाइयों से दूर, आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित है, जबकि खेतों और गांवों में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
अंत में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने सरकार से मांग की कि वह किसान, मज़दूर, आदिवासी समाज और ग्रामीण भारत को केंद्र में रखकर अपनी नीतियों और बजटीय प्रावधानों पर दोबारा गंभीरता से विचार करे, ताकि देश का अन्नदाता और मेहनतकश वर्ग सम्मान के साथ जीवन जी सके।

